(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.35. अध्यायः 035
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरम्प्रति मनोवाक्कायरूपकरणैर्दुष्कर्मपरित्पागपूर्वकं शुभकर्मकरणस्य भगवत्प्रसादनहेतुत्वोक्तिः॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

किं कर्तव्यं मनुष्येण लोकयात्राहितार्थिना।
कथं वै लोकयात्रां तु किंशीलश्च समाचरेत्॥ 13-35-1(82216)
भीष्म उवाच। 13-35-2x(6834)
`देवे नारायणे भक्तिः शंकरे साधुपूजया।
ध्यानेनाथ जपः कार्यः स्वधर्मैः शुचिचेतसा॥' 13-35-2(82217)
कायेन त्रिविधं कर्म वाचा चापि चतुर्विधम्।
मनसा त्रिविधं चैव दश कर्मपथांस्त्यजेत्॥ 13-35-3(82218)
प्राणातिपातः स्तैन्यं च परदाराभिमर्शनम्।
त्रीणि पापानि कायेन सर्वतः परिवर्जयेत्॥ 13-35-4(82219)
असत्प्रलापं पारुष्यं पैशुन्यमनृतं तथा।
चत्वारि वाचा राजेन्द्र न जल्पेन्नानुचिन्तयेत्॥ 13-35-5(82220)
अनभिध्या परखेषु सर्वसत्वेषु सौहृदम्।
कर्मणां फलमस्तीति त्रिविधं मनसा चरेत्॥ 13-35-6(82221)
तस्माद्वाक्वायमनसा नाचरेदशुभं नरः।
शुभान्येवाचरँल्लोके भक्तो नारायणस्य हि।
तस्यैव तु पदं सूक्ष्मं प्रसादादश्नुयात्परम्॥' ॥ 13-35-7(82222)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ 35 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-35-1 लोकयात्रां लोकद्वयश्रेयःसाधनम्॥ 7-35-3 सुभं कर्मफलं चरेदिति ध.पाठः॥ 7-35-4 प्राणातिपातो हिंसा॥ 7-35-5 पारुष्यं निष्ठुरभाषणम्। पैशुन्यं राजद्वारादौ परदोषसूचनम्। अनतं मिथ्यावादः मनसाप्येवं वदिष्यामिति नानुचिन्तयेत्॥ 7-35-6 अनभिध्येति श्लोकेन परद्रव्येष्वभिध्यानं परस्यानिष्टचिन्तनं वेदबादेषु नास्तिक्यमिति त्रीणि त्याज्यानि लक्षयेत्। त्यजेदित्युपक्रमात्॥


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